कई बार वैचारिक धरातल पर सोचता हूँ कि यदि देश में धर्म की विविधता न होती। जातियों में बंटा समाज न होता ,तब भी क्या राजनीति का यही स्वरूप होता, जो वर्तमान में है। निसंदेह देश का दुर्भाग्य यही है कि धर्म और जाति प्रथम प्राथमिकताएं हैं , राष्ट्र उसके बाद। देश में फसाद की असली जड़ ही धार्मिक और जातीय संकीर्णता है , जिसको बढ़ावा देने के लिए सियासत आरक्षण एवं तुष्टिकरण जैसे कुचक्रों से समाज को स्वार्थ का चश्मा पहनने के लिए विवश करती है , जो विघटन का एक मुख्य कारण है।
- सुधाकर आशावादी
- सुधाकर आशावादी
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