मंगलवार, 18 सितंबर 2012

आज का चिंतन :
वर्तमान दौर आम आदमी को बलि का बकरा बना दिया गया है,न कोई अपील न सुनवाई सीधे सूली पर उसे लटकाया जा रहा है ।इतनी अधिक महंगाई कर दी गयी है,कि आम आदमी का स्वांस लेना दूभर हो रहा है,ऐसे में सवाल यह है कि कॉँग्रेस का हाथ आखिर कब तक आम आदमी की कमर पर हथौड़ा बनकर चलेगा ?

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

जाति व्यवस्था को सियासत ने समाज का कोढ़ बनाकर रख दिया है, पहले जातियाँ कर्म पर आधारित हुआ करती थी,शिक्षक को पंडित सरीखा सम्मान था,व्यापारी को वैश्य का सम्मान था ,सभी लोह सेठजी या लालाजी कहकर सम्मान प्रदर्शित करते थे,इस प्रकार मानव मात्र को कर्म से जोड़ा गया,अब कर्महीन लोग स्वार्थ के लिए जातियों में सिमट कर अलगावी भाषा बोल रहे हैं, इन नासमझों को कौन समझाए कि  सियासत के डायनासोर इन्हें कच्चा चबाने की फ़िराक में हैं ।

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

अलगाव की भाषा बोलने वालों की देश में कोई कमी नहीं है, अब राज ठाकरे को ही लीजिए,उनके पैरों तले धरती भी नहीं है और चले हैं महाराष्ट्र की ठेकेदारी करने,अपनी सियासत चमकाने के लिए अलगाव की राजनीति करने वाले तत्वों को आखिर देश कैसे स्वीकार कर रहा है ? सियासत चाहे अल्पसंख्यकों के नाम पर हो या क्षेत्रीयता के नाम पर,इसे किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए ।