शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

जाति व्यवस्था को सियासत ने समाज का कोढ़ बनाकर रख दिया है, पहले जातियाँ कर्म पर आधारित हुआ करती थी,शिक्षक को पंडित सरीखा सम्मान था,व्यापारी को वैश्य का सम्मान था ,सभी लोह सेठजी या लालाजी कहकर सम्मान प्रदर्शित करते थे,इस प्रकार मानव मात्र को कर्म से जोड़ा गया,अब कर्महीन लोग स्वार्थ के लिए जातियों में सिमट कर अलगावी भाषा बोल रहे हैं, इन नासमझों को कौन समझाए कि  सियासत के डायनासोर इन्हें कच्चा चबाने की फ़िराक में हैं ।

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