यह सियासत देश को किस स्तर तक निकृष्टता की ओर धकेलेगी,कहना मुश्किल है,क्योंकि मानवता को ठुकरा कर सियासत के सिपहसालार समाज को संकीर्णता में धकेल रहे हैं,धर्म,संप्रदाय और जातियों में जन मानस को बांटकर जो सियासत की जा रही है,वह समाज को जोड़ने वाली न होकर विघटनकारी है,जिसकी जितनी निंदा की जय,वह कम है ।====आशावादी
शुक्रवार, 16 नवंबर 2012
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