सोमवार, 28 जनवरी 2013

मैंने यूँ ही सच कह दिया था
मज़ाक मज़ाक में
और तुम बुरा मान गए
सच ही तो है
अब सच मज़ाक लगता है
और झूठ सच
तभी तो तुम भी झूठ पर विश्वास करके
सत्य को झुठलाते हो
झूठ पर मुस्कराते हो
और सच सुनकर बुरा सा मुँह बनाते हो
गोया सच की कड़वाहट
विषैला कर गयी हो तुम्हारा
अपना बुना हुआ चटखारेदार स्वाद ...?
- सुधाकर आशावादी 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

अस्तित्व की खातिर :
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जंगल राज में हर कोई जुटा है 
अपने अस्तित्व की रक्षा में । 
क्योंकि सबल नौंच खाने को 
आतुर है हर निर्बल को 
और निर्बल भयातुर है 
अपनी प्राण रक्षा के लिए ।
सृष्टि का अस्तित्ववादी सिद्धांत 
हर ओर अपना असर दिखा रहा है 
समाज में पग-पग पर आदमी को 
उसका अस्तित्व बता रहा है ।।
- डॉ.सुधाकर आशावादी 

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

जहाँ लोगों पर अपना घर संभालना भारी पड़ता है,वहाँ देश सँभालने की बात बहुत बड़ी है । भारत वैसे ही विषमताओं का देश है, कॉंग्रेस हो या भाजपा यदि महंगाई पर अंकुश नहीं लगा सकते या अलगावी चिंतन से देश को निजात नहीं दिला सकते,तो चाहे कितने ही चिंतन कर लें ,सभी निरर्थक हैं ।
- आशावादी 
सच्ची बात चाहे कितनी भी कडवी हो,मगर सच्ची होती है ,सच्चाई सदैव मार्गदर्शक होती है,जिसे स्वीकार करके जीवन के लक्ष्यों को भले ही विलम्ब से प्राप्त करें,मगर उनकी प्राप्ति से जो सुख प्राप्त होता है,वह हजारों ,लाखों झूठ से प्राप्त सफलता से भी प्राप्त नहीं हो सकता,यह सुखद अनुभूति का विषय है,सो जीवन में सच को स्वीकारना ही जीवन का प्रथम एवं अंतिम उद्देश्य होना चाहिए ।
- सुधाकर आशावादी