सोमवार, 12 नवंबर 2012

तन समर्पित मन समर्पित 
और यह जीवन समर्पित 
लिख दिए हैं समर्पण गीत  
दीप के उत्सर्ग का संगीत 
राग उज्जवलता का दीपक गा रहा 
रूप उसका सबके मन को भा रहा 
दीप का उत्सव मनाएंगे सभी 
अब अँधेरे रह न पाएंगे कभी ।।
===============आशावादी 

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

कुर्बानियों के दौर में हम जी रहे हैं
रक्त बहता है मगर हम जी रहे हैं
हैं यहाँ कुरबान धरती पर सभी जो
देश की खातिर गरल हम पी रहे हैं ।।
============= आशावादी 

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

चलिए ....कुछ समाजसेवा करते हैं ....मैंने मित्र से कहा ।
समाजसेवा ...मतलब ...पहले अपनी ही सेवा कर लीजिए
बाद में समाजसेवा की सोचिए ।
सोचता हूँ अपना घर में बुजुर्गों की सेवा करूँ । मैंने कहा ।
क्या आप अपने घर में अपने माता पिता की सेवा करते
हैं ...? उसने कहा ।
मुझसे कोई ज़वाब देते न बना ।

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

देश भ्रष्टाचार के आकंठ में किस कदर डूबा हुआ है,इसका खुलासा रोज हो रहा है,अब कानून मंत्री जी का ट्रस्ट भी सवालों के घेरे में है,मैं नहीं कहता कि केजरीवाल और उनके समर्थक दूध से धुले हैं,मगर सवालों की ज़वाबदेही ज़िम्मेदार पदों पर बैठे दिशानायकों की कम नही है, लगता है कि कॉँग्रेस की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है,सारे आरोपों में कॉँग्रेस का हाथ ही भ्रष्टाचारी नज़र आ रहा है ।

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

आज का चिंतन :
वर्तमान दौर आम आदमी को बलि का बकरा बना दिया गया है,न कोई अपील न सुनवाई सीधे सूली पर उसे लटकाया जा रहा है ।इतनी अधिक महंगाई कर दी गयी है,कि आम आदमी का स्वांस लेना दूभर हो रहा है,ऐसे में सवाल यह है कि कॉँग्रेस का हाथ आखिर कब तक आम आदमी की कमर पर हथौड़ा बनकर चलेगा ?

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

जाति व्यवस्था को सियासत ने समाज का कोढ़ बनाकर रख दिया है, पहले जातियाँ कर्म पर आधारित हुआ करती थी,शिक्षक को पंडित सरीखा सम्मान था,व्यापारी को वैश्य का सम्मान था ,सभी लोह सेठजी या लालाजी कहकर सम्मान प्रदर्शित करते थे,इस प्रकार मानव मात्र को कर्म से जोड़ा गया,अब कर्महीन लोग स्वार्थ के लिए जातियों में सिमट कर अलगावी भाषा बोल रहे हैं, इन नासमझों को कौन समझाए कि  सियासत के डायनासोर इन्हें कच्चा चबाने की फ़िराक में हैं ।

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

अलगाव की भाषा बोलने वालों की देश में कोई कमी नहीं है, अब राज ठाकरे को ही लीजिए,उनके पैरों तले धरती भी नहीं है और चले हैं महाराष्ट्र की ठेकेदारी करने,अपनी सियासत चमकाने के लिए अलगाव की राजनीति करने वाले तत्वों को आखिर देश कैसे स्वीकार कर रहा है ? सियासत चाहे अल्पसंख्यकों के नाम पर हो या क्षेत्रीयता के नाम पर,इसे किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए ।