शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014
Ashawadi Post: कई बार वैचारिक धरातल पर सोचता हूँ कि यदि देश में ध...
Ashawadi Post: कई बार वैचारिक धरातल पर सोचता हूँ कि यदि देश में ध...: कई बार वैचारिक धरातल पर सोचता हूँ कि यदि देश में धर्म की विविधता न होती। जातियों में बंटा समाज न होता ,तब भी क्या राजनीति का यही स्वरूप होत...
कई बार वैचारिक धरातल पर सोचता हूँ कि यदि देश में धर्म की विविधता न होती। जातियों में बंटा समाज न होता ,तब भी क्या राजनीति का यही स्वरूप होता, जो वर्तमान में है। निसंदेह देश का दुर्भाग्य यही है कि धर्म और जाति प्रथम प्राथमिकताएं हैं , राष्ट्र उसके बाद। देश में फसाद की असली जड़ ही धार्मिक और जातीय संकीर्णता है , जिसको बढ़ावा देने के लिए सियासत आरक्षण एवं तुष्टिकरण जैसे कुचक्रों से समाज को स्वार्थ का चश्मा पहनने के लिए विवश करती है , जो विघटन का एक मुख्य कारण है।
- सुधाकर आशावादी
- सुधाकर आशावादी
सोमवार, 28 जनवरी 2013
मैंने यूँ ही सच कह दिया था
मज़ाक मज़ाक में
और तुम बुरा मान गए
सच ही तो है
अब सच मज़ाक लगता है
और झूठ सच
तभी तो तुम भी झूठ पर विश्वास करके
सत्य को झुठलाते हो
झूठ पर मुस्कराते हो
और सच सुनकर बुरा सा मुँह बनाते हो
गोया सच की कड़वाहट
विषैला कर गयी हो तुम्हारा
अपना बुना हुआ चटखारेदार स्वाद ...?
- सुधाकर आशावादी
मज़ाक मज़ाक में
और तुम बुरा मान गए
सच ही तो है
अब सच मज़ाक लगता है
और झूठ सच
तभी तो तुम भी झूठ पर विश्वास करके
सत्य को झुठलाते हो
झूठ पर मुस्कराते हो
और सच सुनकर बुरा सा मुँह बनाते हो
गोया सच की कड़वाहट
विषैला कर गयी हो तुम्हारा
अपना बुना हुआ चटखारेदार स्वाद ...?
- सुधाकर आशावादी
शुक्रवार, 25 जनवरी 2013
अस्तित्व की खातिर :
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जंगल राज में हर कोई जुटा है
अपने अस्तित्व की रक्षा में ।
क्योंकि सबल नौंच खाने को
आतुर है हर निर्बल को
और निर्बल भयातुर है
अपनी प्राण रक्षा के लिए ।
सृष्टि का अस्तित्ववादी सिद्धांत
हर ओर अपना असर दिखा रहा है
समाज में पग-पग पर आदमी को
उसका अस्तित्व बता रहा है ।।
- डॉ.सुधाकर आशावादी
शुक्रवार, 18 जनवरी 2013
सच्ची बात चाहे कितनी भी कडवी हो,मगर सच्ची होती है ,सच्चाई सदैव मार्गदर्शक होती है,जिसे स्वीकार करके जीवन के लक्ष्यों को भले ही विलम्ब से प्राप्त करें,मगर उनकी प्राप्ति से जो सुख प्राप्त होता है,वह हजारों ,लाखों झूठ से प्राप्त सफलता से भी प्राप्त नहीं हो सकता,यह सुखद अनुभूति का विषय है,सो जीवन में सच को स्वीकारना ही जीवन का प्रथम एवं अंतिम उद्देश्य होना चाहिए ।
- सुधाकर आशावादी
- सुधाकर आशावादी
शुक्रवार, 16 नवंबर 2012
यह सियासत देश को किस स्तर तक निकृष्टता की ओर धकेलेगी,कहना मुश्किल है,क्योंकि मानवता को ठुकरा कर सियासत के सिपहसालार समाज को संकीर्णता में धकेल रहे हैं,धर्म,संप्रदाय और जातियों में जन मानस को बांटकर जो सियासत की जा रही है,वह समाज को जोड़ने वाली न होकर विघटनकारी है,जिसकी जितनी निंदा की जय,वह कम है ।====आशावादी
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